Diwali Special : वृन्दावन में विधवाओं ने यमुना किनारे मनाई दिवाली...

युगों-युगों से अपने जीवन के अंधकार से मुक्ति के लिए वृंदावन में रहने वाली विधवा माताओं ने वृंदावन के ऐतिहासिक केसी घाट पर यमुना नदी के तट पर दीपावली मनाई।

Diwali Special : वृन्दावन में विधवाओं ने यमुना किनारे मनाई दिवाली...

Mathura (Madan Sarswat) || युगों-युगों से अपने जीवन  के अंधकार से मुक्ति के लिए वृंदावन में रहने वाली विधवा माताओं ने वृंदावन के ऐतिहासिक केसी घाट पर यमुना नदी के तट पर दीपावली मनाई। सोशल डिस्टन्सिंग का पालन करते हुए, विभिन्न आश्रय घरों में रहने वाली विधवाओं ने यमुना किनारे रंगीन दीयों और रंगोली के साथ मनाया दीपावली पर्व |

लगातार कई वर्षों से हजारों विधवाओं ने इस तरह के समारोहों में हिस्सा लिया, लेकिन कोविद -19 प्रतिबंधों के कारण इस बार की संख्या सीमित रखी गई जिससे कोई परेशानी पैदा ना हो जबकि यह लगातार नौवॉ वर्ष है जब विधवाओं ने प्रतीकात्मक रूप से रोशनी के उत्सव में भाग लिया। यह कार्यक्रम सुलभ  फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया जाता है। जबकि माना जाता है कि पहले हिंदू परंपरा के अनुसार, इन विधवाओं को इस तरह के किसी भी अनुष्ठान में भाग लेने की अनुमति नहीं होती थी मगर वृन्दावन में ये माताएं अपने पिछले जीवन को भूलकर खुसी खुशी इस कार्यक्रम में शामिल होती है क्यो कि इसी को अपना परिवार मानती है और सुख दुख आपस मे बाटती है  हजारों की संख्या में विधवाएँ, ज्यादातर पश्चिम बंगाल की हैं जो कि, वृंदावन में वर्षो से रह रही हैं और उन्हें अनुष्ठानों में भाग लेने की अनुमति नहीं थी, जब तक कि सामाजिक संगठन सुलभ इंटरनेशनल ने उनकी मदद नहीं की। खुशी की एक किरण लाने और विधवापन की परंपरा का मुकाबला करने के उद्देश्य से, सुलभ आंदोलन के संस्थापक, प्रसिद्ध समाज सुधारक डॉ। बिंदेश्वर पाठक, विशेष रूप से विधवाओं के लिए रोशनी के त्योहार को आयोजित करने के लिए इस अनूठे विचार के साथ आए। उनका संगठन 2012 से वृंदावन और वाराणसी में विभिन्न आश्रमों में रहने वाली सैकड़ों विधवाओं की देखभाल करता है।यह संगठन समय-समय पर उनके लिए अन्य कार्यों का आयोजन करके विधवाओं के जीवन को जोड़ने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
 फाउंडेशन की उपाध्यक्ष विनीता वर्मा ने बताया कि डॉक्टर पाठक का प्रयास 10 सालों से लगातार रहा है और जिस तरह से माताओं के चेहरे पर खुशी और शांति दी है वो बहुत ही अलग है  जबकि हम सब परिवार में त्याहारों को मनाते हैं जबकि इन माताओं से पूछिए कि इस त्योहार को मना कर इनको कितनी खुशी हुई है इनको समाज से जोड़ने का काम पाठक जी ने किया है  समाज की मनोवृति बदली है की महिला का विधवा होना कोई अभिशाप नहीं है यह तो एक जीवन का चुनाव है जो कभी भी ऊंचा नीचा होता रहता है और हम चाहते है  यह माताएं हमेशा खुश रहे।